आज के दौर में रिश्तों को तोड़ने वाला सबसे खामोश ज़हर अगर कोई है, तो वह है चुगलखोरी। सामने मीठी बातें और पीठ पीछे ज़हर उगलने वालों की कमी नहीं है। ऐसे लोग न खुद सुकून में रहते हैं, न दूसरों को चैन से जीने देते हैं। चुगलखोरों पर शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि उन नक़ाबपोश चेहरों को आईना दिखाने का एक तरीका है, जो हर महफ़िल में आग लगाने का हुनर रखते हैं। इस ब्लॉग में आप पढ़ेंगे ऐसी शायरियाँ, जो दिल की भड़ास भी निकालेंगी और सोचने पर भी मजबूर कर देंगी।
चुगलखोरों पर शायरी

चेहरे पे मुस्कान, दिल में ज़हर भरा रखते हैं,
चुगलखोर लोग ही रिश्तों को जला रखते हैं।

जो हर बात इधर से उधर पहुँचाते हैं,
वही खुद को सबसे सच्चा बताते हैं।

हम सामने जो हैं, वही रहते हैं हर हाल में,
चुगलखोरों का क्या, रंग बदलते हैं हर चाल में।

किरदार अगर साफ़ हो तो डर कैसा बदनामी का,
चुगलखोर ही शोर मचाते हैं अपनी नाकामी का।

नज़रें झुकी रहती हैं, बातें ऊँची होती हैं,
चुगलखोरों की दोस्ती हमेशा झूठी होती है।
चापलूसी चुगलखोरों पर शायरी
हमने चुप रहना सीख लिया है अब,
क्योंकि चुगलखोरों की सज़ा वक़्त खुद देता है।
चेहरे पर नक़ाब, ज़ुबान में ज़हर रखते हैं,
चुगलखोर लोग रिश्तों का क़त्ल करते हैं।
सामने मीठे, पीछे खंजर चलाते हैं,
चुगलखोर ही रिश्तों में आग लगाते हैं।
जहाँ दो लोग हँसते दिख जाएँ साथ,
चुगलखोर वहीं बना लेते हैं बात।
जो सच बोलने से डरते हैं हर बार,
वही चुगली को बना लेते हैं हथियार।
चमचागिरी चुगलखोरों पर शायरी
रिश्तों की बुनियाद ही झूठ पर रखते हैं,
चुगलखोर फिर भी खुद को शरीफ़ कहते हैं।
कभी इस कान में, कभी उस कान में,
चुगलखोर जीते हैं बस अफ़वाहों के जहान में।
हमने वक़्त पर पहचान लिया,
इसलिए चुगलखोरों से फ़ासला बना लिया।
नज़रें नीची, आवाज़ में चालाकी,
चुगलखोरों की यही पहचान है बाकी।
जो खुद कुछ नहीं कर पाते ज़िंदगी में,
वही दूसरों की बातें फैलाते हैं गली में।
नीच चुगलखोरों पर शायरी
चुगलखोरों से दूर रहना ही बेहतर है,
ये मीठा ज़हर सबसे खतरनाक ज़हर है।
हमने साफ़ दिल से निभाया हर रिश्ता,
चुगलखोरों ने तोड़ दिया हर किस्सा।
बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना,
चुगलखोरों का पुराना पेशा है यारों।
हम सामने जो हैं, वही रहते हैं,
चुगलखोर हर जगह नए चेहरे रखते हैं।
जिन्हें हर कहानी में मिर्च-मसाला चाहिए,
समझ लो वही चुगलखोर कहलाने के लिए काफी हैं।
सच बोलने की हिम्मत नहीं जिनमें,
वही पीठ पीछे वार करते हैं।
हम चुप रहे तो खेल समझ लिया,
चुगलखोरों ने खुद को शेर समझ लिया।
वक़्त सब दिखा देता है एक दिन,
चुगलखोर भी बेनक़ाब हो जाते हैं यक़ीनन।
हम सामने जो कहते हैं, वही निभाते हैं,
चुगलखोर पीठ पीछे ही अपने हुनर दिखाते हैं।
सामने मीठे, पीछे ज़हर उगलते हैं,
चुगलखोर जहाँ जाएँ, रिश्ते ही जलते हैं।
चुगलखोर दोस्त पर शायरी
औक़ात नहीं सामने सच कहने की,
इसलिए चुगली को बना लिया धंधा है।
खुद की ज़िंदगी खोखली सी है,
इसलिए दूसरों की आग में रोटी सेंकते हैं।
हमारी ख़ामोशी को कमजोरी समझ लिया,
चुगलखोरों ने खुद को बहुत समझदार समझ लिया।
नज़रें नीची, बातें ज़हरीली,
चुगलखोरों की पहचान बड़ी जहरीली।
सामने राम-राम, पीछे साज़िश तमाम,
चुगलखोरों का यही है असली काम।
निष्कर्ष
चुगलखोरों पर शायरी सिर्फ़ कटाक्ष नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए एक सटीक जवाब है जो पीठ पीछे वार करने को ही अपनी ताक़त समझते हैं। ऐसी शायरी हमें सिखाती है कि हर बात का जवाब देना ज़रूरी नहीं होता, कभी-कभी ख़ामोशी ही सबसे बड़ा हथियार बन जाती है। चुगलखोरों पर शायरी के ज़रिए हम न सिर्फ़ अपने दिल की भड़ास निकालते हैं, बल्कि यह भी समझते हैं कि रिश्तों को बचाने के लिए सही लोगों को पहचानना कितना ज़रूरी है।