शादी के बाद रिश्ते सिर्फ दो लोगों के बीच नहीं रहते, बल्कि दो परिवारों से जुड़ जाते हैं। लेकिन जब इस रिश्ते में मायके के दखल से शायरी जैसी भावनाएँ जन्म लेने लगती हैं, तब प्यार, भरोसा और सुकून धीरे-धीरे सवालों में बदल जाता है। कई बार पत्नी के मायके का जरूरत से ज़्यादा हस्तक्षेप पति-पत्नी के रिश्ते में दरार पैदा कर देता है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता। ऐसी ही अनकही पीड़ा, गुस्सा और टूटते रिश्तों की सच्चाई को दर्शाती है यह मायके के दखल से शायरी, जो दिल की आवाज़ बनकर सामने आती है।
मायके के दखल से शायरी
मायके की सलाह ने घर उजाड़ दिया,
जो रिश्ता दिल से जुड़ा था, उसे दिमाग ने बिगाड़ दिया।
बीवी मेरी थी, फैसले उनके होते गए,
मायके के दखल में हम अकेले रोते गए।
एक घर बसाया था सुकून के लिए,
मायके की दखल ने उसे जंग बना दिया।
हर बात पे मायके की मुहर लगती रही,
इसलिए हमारी आवाज़ दबती रही।
रिश्ता पति-पत्नी का था,
पर कंट्रोल मायके का निकला।
बीवी से बात कम,
मायके से परमिशन ज़्यादा होने लगी।
हर झगड़े की जड़ एक ही निकली,
मायके की ज़रूरत से ज़्यादा दखल।
पति की बात में वज़न कम हो गया,
मायके की राय भारी हो गई।
घर बसाने आए थे मिलकर,
मायके ने दीवारें खड़ी कर दीं।
मायके की हर सीख सही नहीं होती,
पर बीवी ये बात समझती नहीं होती।
बीवी मेरी थी पर साथ उनका था,
इसलिए रिश्ता धीरे-धीरे खत्म होता गया।
जहाँ पति की कद्र नहीं,
वहाँ मायके का राज होता है।
रिश्तों में जब बाहरी दखल बढ़ जाए,
तो प्यार भी बोझ बन जाता है।
हम चुप रहे रिश्ते के लिए,
मायके ने शोर मचाया ज़िद के लिए।
बीवी को समझाया बहुत,
पर मायके की आवाज़ ऊँची थी।
घर में सुकून ढूंढते रहे,
मायके की राजनीति समझते रहे।
पति की गलती छोटी थी,
मायके ने उसे अपराध बना दिया।
बीवी से शिकायत नहीं है मुझे,
मायके की दखल से तकलीफ़ है।
रिश्ता दो लोगों का था,
पर दखल चार लोगों का हो गया।
बीवी से कम,
मायके से ज़्यादा लड़ना पड़ा।
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